चंद्रगुप्त मौर्य
चंद्रगुप्त
मौर्य का जन्म 340 ई. पूर्व पाटलीपुत्र बिहार में मौरिय अथवा मौर्य वंश
के क्षत्रिय कुल में हुआ था. उनकी माता का नाम मुरा तथा पिता का नाम नंदा था. वह बचपन
से ही गरीब थे. उनके पिता नंदों की सेना के अधिकारी थे जो किसी कारणवश नंदों द्वारा
मार दिए गए थे. उनके पिता की मृत्यु उनके जन्म से पहले ही हो गयी थी. जब चन्द्रगुप्त
मौर्य 10 साल के थे तो उनकी माँ भी चल बसी थी. इन सारी चीज़ो को जानकर
हम यह कह सकते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया होगा. उनकी माँ की मौत
के बाद उनकी परवरिश चाणक्य नाम के ब्राह्मण ने की थी.
चन्द्रगुप्त
मौर्य का वैवाहिक जीवन
कहा जाता है की चन्द्रगुप्त मौर्य
की दो पत्नियाँ थी. जिसमे पहली पत्नी का नाम दुर्धरा था और दूसरे पत्नी का नाम हेलना
था. दुर्धरा से उन्हें बिन्दुसार नाम का पुत्र प्राप्त हुआ और हेलना से जस्टिन नाम
का पुत्र हुआ. कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त
मौर्य का पालन-पौषण करने वाले चाणक्य उन्हें दुश्मनों से बचाने के लिए
खाने में थोड़ा-थोड़ा ज़हर मिला कर दिया करते थे.
ऐसा वो इसलिए करते थे ताकि उनके शरीर
में प्रतिरोधक क्षमता आ जाए और उनके शत्रु उन्हें अगर कभी ज़हर से मारने की कोशिश करे
तो ज़हर से उन्हें कुछ ना हो सके. इस खाने को चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी पहली पत्नी दुर्धरा
के साथ बांटते थे. एक दिन उनके शत्रु उनके खाने में ज्यादा मात्रा में ज़हर मिला देतें
है जिसके कारण गर्भवती दुर्धरा की मृत्यु हो जाती है लेकिन चाणक्य समय पर पहुंच कर
उनके बेटे को बचा लेते हैं. बिन्दुसार के बेटे का नाम अशोका था जिनके नाम से बिन्दुसार
को आज तक याद किया जाता है. अशोका एक बहुत महान राजा थे.
मौर्य साम्राज्य
की स्थापना
मौर्य साम्राज्य की स्थापना की अगर
बात की जाए तो उसको स्थापित करने का पूरा श्रेय चाणक्य को दिया जाता है. उस समय चाणक्य
ने चन्द्रगुप्त मौर्य को
वचन दिया था कि वह चन्द्रगुप्त को उनका हक दिलाकर रहेंगे और नवदास की राजगद्दी पर बिठाएंगे.
जिस समय अलेक्सेंडर भारत पे हमला करने की तयारी कर रहा था उस समय चाणक्य तकशिला में
अध्यापक थे. तकशिला के राजा व गन्धरा दोनों ने ही अलेक्सेंडर के सामने डर से घुटने
तक दिए थे. यह सब देखकर चाणक्य ने फैसला किया कि वे देश के अलग-अलग राजाओं से मदद मांगेंगे.
उन्होंने पंजाब के राजा को अलेक्सेंडर का सामना करने को कहा लेकिन वे उन्हें हराने
में असफल रहे. ऐसे बहुत से घटनाएं हुई और चाणक्य ने उसके बाद फैसला किया कि वे अपना
साम्राज्य खड़ा करेंगे. इस साम्राज्य को चलाने के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य को चुना और
इन सभी चीज़ो की वजह से चाणक्य को आज भी मौर्य साम्राज्य का प्रधानमंत्री कहा जाता है.
चन्द्रगुप्त
मौर्य की मृत्यु
चन्द्रगुप्त जब 50 वर्ष
के थे तो उन्होंने जैन धर्म को अपना लिया था. इसी के चलते उन्होंने 298 B.C. में अपना
साम्राज्य अपने बेटे बिन्दुसार को सौंप दिया था और वह कर्नाटक चले गए थे. उन्होंने
वहाँ पहुंचते ही बिना भोजन किये 5 हफ्तों तक ध्यान किया, जिसे संथारा कहते हैं. इस
संध्या को तब तक किया जाता है जब तक आप मर न जाओ. चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी यह तब तक
किया जब तक उनके प्राण नहीं चले गए.

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